मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

आज फिर दिखा सेहतमंद नाश्ता....

अभी मैं टहलने गया हुआ था.. जहां पर जाते हैं वहां एक बाबा जी का सत्संग चल रहा था ..

सुबह का समय है, बहुत से लोग बाहर से अपना नाश्ता ले कर अंदर आ रहे थे....

मुझे पता है ऐसे मौकों पर नाश्ते का ध्यान आते ही पूड़ी-छोले, भटूरे छोले, जलेबी, समोसे, कचौड़ी का ध्यान आता है ...लेकिन प्रशंसा करनी पड़ेगी कि मैंने यह कहीं भी आसपास बिकता नहीं देखा...

बहुत से लोग बाहर से भुने हुए चने और पेठा लेकर आ रहे थे, लिफ़ाफों में ...अच्छा लगा मुझे यह देख कर ..

मैंने बाहर आ कर भी देखा ...इन सब चीज़ों की ही रेहड़ीयां लगी हुई थीं...भुने चने, केले, पेठा, लईया (चिवड़ा, फुलियां), खीरे-ककड़ी ...


कईं बार ऐसा लगता है कि हम लोग पैसे से अपनी आफ़त ही खरीदते हैं...जितने विकल्प किसी के पास कम होते हैं, मैंने देखा है वे उतना ही पौष्टिक नाश्ता कर लेते हैं...पर्यावरण के साथ साथ जेब, सेहत और साफ़-सफ़ाई के लिए भी उत्तम।

आप सफ़र के दौरान भी देखते होंगे कि बहुत से लोग अपना खाना साथ ही लेकर चलते हैं...वे लंबे समय पर चलने वाला खाना बनाने और रखने के सभी जुगाड़ अच्छे से जानते-समझते हैं... लईया-चना, चिवड़ा, सत्तू ....इतने सारे बेहतर विकल्प इन के पास उपलब्ध रहते हैं..

और मेरे जैसे वे लोग जो यह समझते हैं कि पैसा खर्च कर कुछ भी खरीद लेंगे, बेवकूफ़ी ही तो है ...जब भी मैंने सफर में ये पूड़ी-छोले, भटूरे छोले खाए, पकौड़े खरीदे, मेरी तबीयत तब तब खराब ही हुई...मैं अधमोया जैसा हो गया....और जैसे तैसे अपने गनतव्य पर पहुंच कर दवाईयां खाकर उस बिगड़ी तबीयत को दुरुस्त करने में लगा रहा..

अकसर हम लोग जो बाहर खाते हैं हमें पता ही नहीं होता किस तरह के बेसन है, कैसा तेल, कैसा दूध ....हां, सब जांच वांच होती रहती हैं, यह हमें अच्छे से ज्ञान है .. लेकिन अगर आप उन जांचों के भरोसे ही रहना चाहें...

ज्ञान नहीं बांट रहा हूं...बस इतना कह कर बात को विराम दूंगा कि बाहर से खरीदे जाने वाले खाने की तरफ़ सजग रहना होगा.. ऐसे ही तो वह कहावत नहीं बन गई...हमारी सेहत हमारे हाथ में!


दरअसल मुझे कहने में कोई हिचक नहीं है कि जिन लोगों के पास धन ज़्यादा है, उन के पास चोंचलेबाजी भी ज़्यादा हैं...ध्यान आ रहा है कुछ दिन पहले बंबई में एक जगह पर कोई रोटी जैसी चीज़ खा रहा था ...(मुझे उस का नाम नहीं पता)...रोटी जैसी ही थी दिखने में तो ...उस के ऊपर गुड़ की शक्कर का लेप लगा हुआ था....बिल्कुल थोड़ा, लेकिन उस का दाम १५० रूपये के करीब था..बताया गया मुझे कि यह रोटी अलग अलग तरह के अनाज को मिला कर तैयार की जाती है .. शाबाश! ..न तो मेरी भूख मिटी न ही प्यास...


अभी ध्यान आ रहा है अमृतसर के नाश्ते का ..हम लोग भी पहले यही सब कुछ रोज़ ही खाया करते थे....


कभी कभी खाने के लिए तो ठीक है यह सब कुछ..

मैं तो बहुत बार मज़ाक में कहता हूं कि अमृतसर के लोग तो भई खाते-पीते ऐसे हैं जैसे कि वे रब की जंज पर आये हुए हों...(रब की शादी पर बाराती बन कर आए हुए हों)...पंजाब में ऐसा खाना ही पसंद किया जाता है .. इसलिए यह फिक्र करने वाली बात है!



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