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सोमवार, 28 मार्च 2016

दिन में एक घंटा अपने लिए...बस!


सुबह सुबह का एक घँटा हमें अपने लिए ऱखना चाहिए...यही तो सुनते हैं हम लोग प्रवचनों में दिन भर...दिन में कुछ वक्त अपने आप को भी देना चाहिए...

लेकिन मैंने यह देखा है कि यह शोर हमारा पीछा वहां भी नहीं छोड़ता...शोर..अंदरूनी भी और बाहरी भी ...अंदरूनी शोर तो शांत होते होते होगा..लेिकन यह बाहरी शोर भी हमें अपने आप से मिलने नहीं देता...

जिस पार्क में टहलने जाता हूं वहां पर लोग योगाभ्यास कर रहे होते हैं...अच्छा लगता है, एक बार मैं भी एक जगह गया, योगाभ्यास करते करते बीच बीच में राजनीति का तड़का लगते देखा तो अजीब सा लगा...फिर से इच्छा नहीं हुई...ऐसा भी नहीं है कि राजनीति की बात ही करना मुनासिब नहीं है, लेकिन वह समय इस के लिए मुफीद नहीं था....बिना वजह उत्तेजित हो जाना...

आज भी देखा कि पार्क में मेरे आगे एक ७०-७५ वर्ष के बुज़ुर्ग टहल रहे थे, अचानक एक फोन...बातचीत से लग रहा था कि किसी "अपने"का ही होगा..लखनऊ के बाशिंदों का बातचीत करने का लहज़ा तो नफ़ीस है ही, बेशक, वे भी कुछ समय तक बड़े आराम से किसी घरेलू समस्या के बारे में फोन करने वाले से बात करते रहे...फिर वे थोड़ा ऊंचा बोलने लगे...फिर उन्हें शायद यह ज़रूरत महसूस हुई कि ये बातें टहलने वाले ट्रैक पर करने की बजाए, पार्क के अंदर किसी बेंच में बैठ कर की जानी चाहिए... लेकिन तब तक उन का स्वर बहुत उग्र हो चुका था... मुझे उन की सेहत की चिंता हो रही थी...

मुझे यह देख कर बहुत बुरा लगा ..इसलिए कि एक बंदा सुबह सवेरे घर से अपने आप से कुछ लम्हे बिताने आया है लेिकन ये फोन करने वाले कमबख्त वहां भी उस का पीछा नहीं छोड़ते ... और वह सुबह पौने सात बजे के करीब का
समय तो इन सब पचड़ों के लिए होता ही नहीं है...

वह बुज़ुर्ग बंदा कुछ समय पहले पेड़ों पर नये नये कपोलों को निहारते हुए ...उन की कोमलता और रंग-रूप का आनंद लेते हुए मजे ले रहा था...लेिकन उस कमबख्त फोन करने वाले ने इस रंग में भंग डाल दिया हो जैसे...कितनी भी ज़रूरी फोन क्यों न हो, इतना ज़रूरी नहीं हो सकता कि यह आधा घंटा इंतज़ार न कर सकता हो..

 नईं फूटी कोमल हरी पत्तियां देख कर बहुत खुशी हुई 

लेकिन लिखते लिखते यह भी ध्यान आ रहा है कि हर शख्स की अपनी मजबूरियां हैं....अपनी अलग परिस्थितियां हैं, ऐसे में क्या टिप्पणी करें!

मैं जिस योग कक्षा की बात कर रहा हूं...वहां पर मैंने जाते जाते सुना एक बंदा वाट्सएप पर वॉयरल हुई उस बात की चर्चा कर रहा था कि पाकिस्तानी क्रिकेट टीम भारत आने से पहले भारत से यह कहती थी कि पहला सुरक्षा दो तभी आएंगे ..लेकिन हारने के बाद अपने देश से यह कहने लगी कि सुरक्षा दो तभी लौटेंगे....यह सुन कर सारे लोग ठहाके लगाने लगे....सारे लोग तो वाट्सएप से जुड़े नहीं होते, ऐसे में जो लोग पहली बार यह सुनते हैं वे भी एंज्वाय करते हैं।



सुबह सुबह का समय अपने लिए तो होता ही है, लेकिन मैंने देखा है कि कुछ यार-दोस्त जो मस्ती से टहल रहे होते हैं वे खूब हंसी मज़ाक करते हुए टहलते हैं ...उन्हें खुश देख कर अपना मन भी खुश हो जाता है ... आज प्रातःकालीन भ्रमण से लौटने के बाद पेपर में इसी विषय पर एक अच्छा सा छोटा लेख दिख गया...ओशो की बात करता हुआ..हंसी मज़ाक के मायने बताता हुए...आप भी पढ़िए.....




एक बार मेरे मन में यह इच्छा हुई कि उन बुज़ुर्ग को कहूं कि भाई साहब, आप करिए इस फोन को बंद कुछ लम्हों के लिए ..और लीजिए मैं आप को एक नुस्खा देता हूं..

बुधवार, 18 मार्च 2015

जीवन चलने का नाम...

मैं अभी अपनी कॉलोनी में ही थोड़ा टहल कर लौटा हूं...ऐसे ही १५-२० मिनट...धूप तेज लगी तौ लौट आया।

मैंने टहलते हुए एक बुज़ुर्ग को देखा...इन की उम्र ८० के थोड़ा इधर उधर होगी...मैं पिछले दो सालों से देख रहा हूं कि इन का नौकर इन को हाथ पकड़ कर सैर करवाता है।

ये बेहद नियमितता से टहलने आते हैं...मौसम कैसा भी हो, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। अच्छा लगता है इन्हें सैर करते देखना...पहले तो अपने नौकर का हाथ थामे हुए भी बहुत ही लड़खड़ाते चला करते थे ..एक हाथ में इन के छड़ी हुया करती थी...आज मैंने देखा कि इन्होंने छड़ी बस ऐसे ही एक हाथ में थामी हुई थी...इस का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे।

बहुत अच्छा लगता है जब कोई इस तरह की दृढ़ इच्छा-शक्ति वाला शख्स मिलता है। बीमारी की ऐसी की तैसी....ये सब तो ८० प्रतिशत हमारे मन की ही उपज हैं....जब शऱीर चलता रहेगा तो मन भी ठीक ही रहेगा।

मैं अकसर इस ब्लॉग पर बहुत से ऐसे लोगों की कहानियां शेयर करता रहता हूं जिनसे कोई भी प्रेरणा ले सकता है। दरअसल इन में से कोई भी कहानी नहीं होती, हर बात सच होती है।

अभी दो तीन पहले ही एक ८४ साल के बुज़ुर्ग आए... पहले फौज में थे, फिर दूसरे विभाग में नौकरी कर ली..दो जगह से पेन्शन पा रहे हैं...बीवी चल बसी है..बच्चे हैं नहीं... घर में अकेले रहते हैं......तो उस दिन अपने आप ही बताने लगे कि डाक्टर साहब, I am completing 84....पच्चीस साल हो गये रिटायर हुए...सारा काम अपना खुद करता हूं...बिल्कुल अपने आप...और इस से मैं बहुत चुस्त दुरूस्त महसूस करता हूं...मुझे याद है वे दो तीन बार आये हैं....हर बार साफ़ स्वच्छ कपड़े पहने रहते हैं....सफेद सूती कमीज़....बिना इस्तरी की हुई...वे इस में भी इतने फिट एवं एक्टिव दिखते हैं...कहते हैं अपने कपड़े रोज़ के रोज़ धो लेता हूं....चाय ऐसी बनाता हूं कि मजा आ जाए...मुझे कहने लगे कि इस बार उन के संत आएंगे तो आप को ज़रूर ले कर जाना है......उसी दिन की बात है कि जब मैं अस्पताल से बाहर निकल रहा था तो मैंने उन्हें साईकिल का ताला खोलते देखा.....वे अभी भी एकदम फिट हैं तो साईकिल से ही अपना ज़्यादातर सफऱ तय करते हैं...मुझे बहुत खुशी हुई। मेरे ख्याल में आपने इन की उम्र ध्यान से पढ़ ही ली होगी....इन्हें अभी ८५ वां साल लगने वाला है। ईश्वर करे ये शतायु हों।

दोस्तो, कल शाम को मेरा सिर थोड़ा भारी था...अकसर हो जाता है, दोपहर खाने के बाद जितनी सुस्ती मुझ पर छा जाती है, मुझे ही पता है.....मैं पिछले लगभग २०-२५ सालों से इस तकलीफ़ से ग्रस्त हूं....लेकिन मेरी बीवी कहती है कि ऐसा सब के साथ ही होता है।

हां, तो कल शाम को मेरा सिर भारी था और हम लोग पास ही के एक बाग जिसे बिजली पासी किला कहते हैं....यह मायावती के कार्यकाल के दौरान बनाया हुआ एक सुदंर स्थल है...मैं वहां पर २०-२५ मिनट टहला, बढिया हवा चल रही थी और हो गई अपनी तबीयत बिल्कुल टनाटन।


मैं क्यों यह सब लिख रहा हूं .. ..आप सब को भी और अपने आप को भी याद दिलाने के लिए कि जहां पर भी मौका मिले अपने शरीर से काम ले लेना चाहिए...इस के बेशुमार फायदे ही हैं....टहलने का बहाना ढूंढे, साईकिल चलाने की वजह ढूंढे.....यह मुश्किल नहीं है बिल्कुल अगर हम ठान लें...

मैं हर शख्स को पैदल चलने के लिए प्रेरित करता रहता हूं... क्योंिक मैं यह भलीभांति जानता हूं कि पैदल चलने से आदमी पहली बात तो यह कि अनेकों मन और शरीर की बीमारियों से बचा रह सकता है और अगर कोई इन सब व्याधियों से ग्रस्त है तो ये भी अपने आप ठीक होने लगती हैं........क्या आप को पता है कि डिप्रेशन (अवसाद) जैसे रोग के लिए भी टहलना अचूक उपाय है!

दोस्तो, जब तक टांगों में दम है, दिल में टहलने की क्षमता है और जीने की उमंग है.......बस टहलते रहिए... पता नहीं कब घुटने की वजह से या अन्य किन्हीं कारणों से किसी से चाहते हुए भी टहला ही नहीं जाए या किसी को डाक्टर ही चलने के लिए मना कर दें।

बस आखिर में एक बात लिख कर नहाने के लिए उठने लगा हूं....यकीन मानिए अगर कोई व्यक्ति पैदल चल रहा है, टहल रहा है तो यह प्रकृति का एक वरदान है.....बिल्कुल वरदान है....आप को मेरी इस बात पर यकीन करना ही होगा कि हमारे पूरे शरीर में ..दिल और दिमाग में भी......अरबों खरबों कोशिकाओं में खरबों या अनगिनत क्रियाएं चल रही हैं... और इन सब शारीरिक प्रक्रियाओं का एक सुंदर परिणाम यह भी है कि आप और मैं चल लेते हैं....अगर कभी किसी में ये प्रक्रियाएं थोड़ी सी भी पटड़ी से नीचे उतरने लगती हैं तो आदमी चाह कर भी एक पैर जमीन पर खड़ा होना तो दूर सीधा खड़ा तक नहीं हो पाता। 

हां, कल एक आदमी की बात सुन कर मूड बड़ा खराब हुआ... वह रिटायर होने वाला है...उस का बेटा बेड पर है...१७ साल की उम्र थी तब जब किसी के स्कूटर के पीछे बैठा था.. स्कूटर किसी से भिड़ गया और उस के बेटे के सिर के पिछले हिस्से पर ऐसा झटका लगा कि वह कभी बेड से उठा नहीं....बड़े से बड़े विशेषज्ञ को दिखा लिया है...वैसे स्वस्थ है, खाता पीता है...२५ साल का हो गया है..लेकिन बिस्तर से उठ ही नहीं पाता......मल त्याग और पेशाब तक भी बिस्तर पर लेटे लेटे ही......गर्दन के दो मनकों को कुछ गड़बड़ हो गई है जिस का कोई इलाज नहीं है।

ईश्वर सब को सेहतमंद रखे। मुझे याद है मैंने लगभग १०-१५ साल पहले एक िकताब पढ़ी थी ..वाकिंग के ऊपर...बहुत ही बेहतरीन किताब थी ...अगर कहीं दिखी तो उस के कुछ अंश आप से शेयर करूंगा.......और आप भी आज ही से टहलने के बहाने ढूंढते रहिए...अच्छा लगता है....जैसे बचपन में रेडियो पर इस गीत को बार बार सुनता अच्छा लगता था.....




शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

मिलखा सिंह जैसे नहीं हैं तो क्या घर बैठ जाएं.....



मिलखा सिंह अगर किसी समाज कल्याण के विज्ञापन में आकर लोगों को सक्रिय रहने के लिए प्रेरित करता तो मुझे बहुत खुशी होती......जब वह एक टॉनिक के विज्ञापन में आकर एक आदमी को कंप्लैक्स देता दिखता है कि क्या आप सीनियर सिटिज़न हैं तो मुझे तो यह ठीक नहीं लगता।

हर आदमी की अपनी शारीरिक क्षमता है...अपनी सीमाएं हैं, अपनी शारीरिक, मानसिक मनोस्थिति है....यह विज्ञापन ज़्यादा ठीक नहीं लगा मुझे कभी, इस से गलत संदेश जाता दिखता है कि जैसे एक चम्मच रोज़ाना खा लेने से ही सब कुछ बदल जाएगा। नहीं, ऐसा नहीं है।

हमें किसी को किसी भी तरह का कंप्लेक्स नहीं देना है.....हर एक को सुबह सवेरे या शाम को घर से निकलने के लिए प्रेरित करना है।

अकसर आपने सुना होगा कि रोज़ाना ३०-४० मिनट रोज़ाना टहलना शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है। यह शरीर और मन में नई स्फूर्ति प्रदान करता है, ऐसा हम सब ने अनुभव तो किया ही है, चाहे हम इस का नियमित अभ्यास करें या ना करें।

तो फिर क्या इस का यह मतलब है कि जो इतना ना चल पाए या इतनी तेज़ न चल पाए... तो वह घर ही बैठ जाए। मुझे लगता है कि लोगों में इस बारे में बहुत गलतफहमी है।

मेरे पास दिन में बहुत से मरीज़ बुझे हुए चेहरे लेकर आते हैं......मुझे पता है कि केवल दवाईयां इन का कुछ नहीं कर पाएंगी। बात करने पर पता चलता है कि वे घर से बाहर निकलते नहीं, टहलने जाते नहीं, घुटने दुःखते हैं.....सांस फूल जाती है। ठीक है, ये सब जीवनशैली से संबंधित रोग एक उम्र के बाद घेर ही लेते हैं लेकिन इस का भी यह मतलब नहीं कि आप घर पर ही डटे रहें और सुबह सुबह सतपाल के आश्रम से बरामद होने वाली ऐश्वर्य की चीज़ों की लिस्ट बनानी शुरू कर दें।

कल ही मेरे पास एक बुज़ुर्ग महिला अपने पति की बात करने लगी कि सारा दिन अखबार, सारा दिन टीवी, सारा दिन खबरें.....कह रही थीं कि घर से निकलते ही नहीं, मैं कईं बार कहती हूं....कि कितनी देखोगे खबरें, क्या प्रधानमंत्री बनोगे?  कह रही थीं कि मेरी तो ज़िंदगी की अपनी इतनी लंबी सीडी तैयार हो चुकी है कि मैं तो वही देख देख कर थक जाती हूं।

आज एक बुज़ुर्ग आया....उसे बहुत सी तकलीफ़ें हैं...मैंने जब टहलने की बात की तो कहते हैं कि हां, सुबह घर की छत पर चला जाता हूं......घर के पास ही एक बाग है, मैंने कहा कि आप वहां चले जाया करें......और रोज़ाना एक घंटा वहां बिताएं.....सूर्योदय का आनंद लें, हरियाली देखें, पक्षियों के गीत सुने, पुराने दोस्तों-परिचितों से हंसी-ठ्ठा करिए.....आप दो चार दिन यह कर के देखिए तो आप अपने आप को कितना खुश पाएंगे.......शायद उन्हें मेरी बात अच्छी लगी, हंसने लगे, कहने लगे कि मेरा ध्यान इस तरफ़ तो कभी गया ही नहीं........मैंने कहा कि यह किस ने कहा कि कि आपने अपनी क्षमता से ज़्यादा तेज़ तेज़ चलना है, हांफना है......ऐसा कुछ नहीं है, आप खुशी खुशी जितना मस्ती से अपनी रफतार में टहल सकते हैं, टहलिए.......३०-२०-१० मिनट टहल कर अगर मन करे तो कहीं बैठ जाएं....फिर से टहलना शुरू कर दें.......वह एक घंटा बस अपने लिए रखें।

वैसे यह नुस्खा हम सब के लिए हैं.....काश, हम सब की परिस्थितियां ऐसी बन पाएं कि वे सुबह का एक घंटा हम सब प्रकृति की गोद में बिता पाएं.......

जिस बाग में मैं जाता हूं उस में जो जगह मुझे बहुत पसंद है ये तस्वीरें मैंने आज सुबह उस जगह की खींची थी......इस जगह पर पहुंचते ही मुझे जंगल में पहुंच जाने का अहसास होता है....



िजस बाग में मैं टहलने जाता हूं वहां का एक कोना
एक बात और है कि बागों में बहुत से बैंच लगे होने चाहिए ताकि कोई भी जब चाहे जहां चाहे बैठ कर सुस्ता लें, ध्यान हो जाए, प्राणायाम कर लें........

तो फिर आपने क्या सोचा.....बस हवन ही करेंगे या मस्ती से थोड़ा बहुत टहलेंगे भी !!